Inspiring People: Napoleon Bonarparte Facts
hi......
Sunday, May 27, 2012
Tuesday, August 18, 2009
Saturday, August 23, 2008
Saturday, August 2, 2008
Sunday, July 27, 2008
प्यार बांटो सभी को ............
प्यार बांटो सभी को तो कुछ बात है
ले लो गैरों के ग़म को तो कुछ बात है
है न वो जीत जीती जो इंसान पर
जीत लो हर दिलों को तो कुछ बात है
मिलती है ही ख़ुशी हर तिजारत के दम
मुफलिशी मे जो खुश हो तो कुछ बात है
मन मे तो जग जाते पल मे सदा
बैर मन से मिटाओ तो कुछ बात है
दूरी दिल मे बनाना न कुछ है कठिन
दूरी दिल से मिटाओ तो कुछ बात है
ले लो गैरों के ग़म को तो कुछ बात है
है न वो जीत जीती जो इंसान पर
जीत लो हर दिलों को तो कुछ बात है
मिलती है ही ख़ुशी हर तिजारत के दम
मुफलिशी मे जो खुश हो तो कुछ बात है
मन मे तो जग जाते पल मे सदा
बैर मन से मिटाओ तो कुछ बात है
दूरी दिल मे बनाना न कुछ है कठिन
दूरी दिल से मिटाओ तो कुछ बात है
काम आये किसी के है वो ज़िन्दगी.....
काम आये किसी के है वो ज़िन्दगी
दे जो दो पल ख़ुशी के है वो ज़िन्दगी
है न वो ज़िन्दगी जो करे फांसले
जो मिटाए है दूरी है वो ज़िन्दगी
देके दुःख जो हंसे ऐसा जीना ही क्या
ले जो गैरो के ग़म को है वो ज़िन्दगी
बांटे है जो दिलों को वो किस काम के
जो मिलाये दिलों को है वो ज़िन्दगी
जो जिए है अकेले क्या है वो जिए
जो सिखाये है जीना है वो ज़िन्दगी
दे जो दो पल ख़ुशी के है वो ज़िन्दगी
है न वो ज़िन्दगी जो करे फांसले
जो मिटाए है दूरी है वो ज़िन्दगी
देके दुःख जो हंसे ऐसा जीना ही क्या
ले जो गैरो के ग़म को है वो ज़िन्दगी
बांटे है जो दिलों को वो किस काम के
जो मिलाये दिलों को है वो ज़िन्दगी
जो जिए है अकेले क्या है वो जिए
जो सिखाये है जीना है वो ज़िन्दगी
जब से गैंरो को अपना.......
जब से गैंरो को अपना बनाने लगे
तब से हर खूबसूरत ज़माने लगे
बस गए हम ही हम ऐसे सब की जुबां
जब से दूरी दिलों की मिटाने लगे
बिन दिए कुछ किसी को यूहीं उठ गए
जब से दिल को दिलो से मिलाने लगे
ढूंढ ते थे जिन्हें बे ही पास आ गए
जब से मन भेद मन से भुलाने लगे
बन गए हम दुआ सबकी फरियाद में
प्रेम जब से दिलों में जगाने लगे
तब से हर खूबसूरत ज़माने लगे
बस गए हम ही हम ऐसे सब की जुबां
जब से दूरी दिलों की मिटाने लगे
बिन दिए कुछ किसी को यूहीं उठ गए
जब से दिल को दिलो से मिलाने लगे
ढूंढ ते थे जिन्हें बे ही पास आ गए
जब से मन भेद मन से भुलाने लगे
बन गए हम दुआ सबकी फरियाद में
प्रेम जब से दिलों में जगाने लगे
Thursday, July 24, 2008
जब होंगा मन में औरों के प्रति प्रेम भाव..........
जब होंगा मन में औरों के प्रति प्रेम भाव
......................ईर्ष्या के दीप अपने आप बुझ जायेंगें
दूसरों के ग़म को जो अपना माना तुमने कभी
.....................सब जगह आप ही बस आप ही आप हो जायेंगें
झुके न झुके कोई झुक जाओ सिर्फ तुम
....................दूरियों के पथ्य अपने आप मिट जायेंगें
माना सब को एक में जो जाना सबको एक में
....................तो एकता के भाव अपने आप जायेंगें
द्वेष,बैर त्याग के जो बढ़ादो हाथ तुम कभी
....................समरस के पुष्प अपने आप खिल जायेंगें
......................ईर्ष्या के दीप अपने आप बुझ जायेंगें
दूसरों के ग़म को जो अपना माना तुमने कभी
.....................सब जगह आप ही बस आप ही आप हो जायेंगें
झुके न झुके कोई झुक जाओ सिर्फ तुम
....................दूरियों के पथ्य अपने आप मिट जायेंगें
माना सब को एक में जो जाना सबको एक में
....................तो एकता के भाव अपने आप जायेंगें
द्वेष,बैर त्याग के जो बढ़ादो हाथ तुम कभी
....................समरस के पुष्प अपने आप खिल जायेंगें
गिर गिर के भी अब तुझको.........
गिर गिर के भी अब तुझको सम्हलना है समझले
न हो आज सफल कल तुम्हे होना है समझले
वह पथ ही क्या जिसमें की शूल मिल ही न पाए
हर शूल को इक पुष्प बनाना है समझले
कुछ करने की कुछ बनने की बस मन में तू रख ले
चूमे चरण हर स्वप्न तेरे कर्म तू कर ले
वह राह ही क्या जिसमे मोड मिल ही न पाए
हर मोड को इक राह बनाना है समझले
बनना न दीप अपने को तू सूर्य बनाले
करके सुबह तू अपने संग सबको जगा ले
वह तूफ़ान ही क्या जिसमे मौज़ हिल ही न पाए
हर मौज़ को इक तूफ़ान बनाना है समझले
न हो आज सफल कल तुम्हे होना है समझले
वह पथ ही क्या जिसमें की शूल मिल ही न पाए
हर शूल को इक पुष्प बनाना है समझले
कुछ करने की कुछ बनने की बस मन में तू रख ले
चूमे चरण हर स्वप्न तेरे कर्म तू कर ले
वह राह ही क्या जिसमे मोड मिल ही न पाए
हर मोड को इक राह बनाना है समझले
बनना न दीप अपने को तू सूर्य बनाले
करके सुबह तू अपने संग सबको जगा ले
वह तूफ़ान ही क्या जिसमे मौज़ हिल ही न पाए
हर मौज़ को इक तूफ़ान बनाना है समझले
तैरते है समुंदर की मौजों पे जो..........
तैरते है समुंदर की मौजों पे जो
कहता है कौन की डूब जाते है वो
रखें है ध्यान हर पल निशाने पे जो
कहता है कौन की चूक जाते है वो
छूना है शौक जिनको बुलंदी सदा
कहता है कौन की टूट जाते है वो
जाते है मंजिलो के जो आगे सदा
कहता है कौन की छूट जाते है वो
कहता है कौन की डूब जाते है वो
रखें है ध्यान हर पल निशाने पे जो
कहता है कौन की चूक जाते है वो
छूना है शौक जिनको बुलंदी सदा
कहता है कौन की टूट जाते है वो
जाते है मंजिलो के जो आगे सदा
कहता है कौन की छूट जाते है वो
हो जो दौलत तो कई ............
हो जो शौहरत तो कई क़रीब मिला करते हैं
हो जो शौहरत तो कई क़रीब मिला करते हैं
जफ़ा से होती हैं शुरू अब इबादत इस जहाँ में
हो जो मिल्कियत तो कई हबीब मिला करते हैं
बिके हैं वक्फ़ ज़माने में अब ये आलम हैं
अब तो मदरसों में भी खुले जाम मिला करते हैं
बने वीरान हर चमन पाके नफ़रत को
अब तो हर बाग़ में कांटे ही मिला करते हैं
ख़्वाब दूर हैं निगाहों से सह सितम पे सितम
अब तो हर मुकाम बस ख्यांलो में मिला करते हैं
हो जो शौहरत तो कई क़रीब मिला करते हैं
जफ़ा से होती हैं शुरू अब इबादत इस जहाँ में
हो जो मिल्कियत तो कई हबीब मिला करते हैं
बिके हैं वक्फ़ ज़माने में अब ये आलम हैं
अब तो मदरसों में भी खुले जाम मिला करते हैं
बने वीरान हर चमन पाके नफ़रत को
अब तो हर बाग़ में कांटे ही मिला करते हैं
ख़्वाब दूर हैं निगाहों से सह सितम पे सितम
अब तो हर मुकाम बस ख्यांलो में मिला करते हैं
हर ग़म के दर्द सहने से ..............
हर ग़म के दर्द सहने से सजती है ज़िन्दगी
अश्कों को हंस के पीने से खिलती है ज़िन्दगी
मांगे से कब मिली है ज़माने की उल्फ़ते
खुद को बुलंद करने से मिलती है ज़िन्दगी
जो थम गए मुकाम की राहों को देखकर
हर साँस मे इक आश से चलती है ज़िन्दगी
अजमाते है जो खुद को ही हर एक मोड पर
ऐसे ही हौंसलों से निखरती है ज़िन्दगी
जज़्बों को जिंदा रख के जो चलते चले गए
सजदे उन्ही के दर पे ही करती है ज़िन्दगी
अश्कों को हंस के पीने से खिलती है ज़िन्दगी
मांगे से कब मिली है ज़माने की उल्फ़ते
खुद को बुलंद करने से मिलती है ज़िन्दगी
जो थम गए मुकाम की राहों को देखकर
हर साँस मे इक आश से चलती है ज़िन्दगी
अजमाते है जो खुद को ही हर एक मोड पर
ऐसे ही हौंसलों से निखरती है ज़िन्दगी
जज़्बों को जिंदा रख के जो चलते चले गए
सजदे उन्ही के दर पे ही करती है ज़िन्दगी
मेरे अंतश की उड़ान..............
मेरे अंतश की उड़ान
नये सृजन की
अपने स्वप्न को
पूर्ण करने की
सदा अपने को
अपूर्ण समझने की
मेरे अंतश की उड़ान
प्रण
नवीन सृष्टि का नहीं
सृष्टि में नवीन का
चेतना का
गति का
जो अभी अवचेतन है
जड़ है
यात्रा
अनन्त तक की
किन्तु आदि से
बोध
स्थूलता का
किन्तु सूक्ष्म से
दृढ़
अपनी क्रिया पर
अपने पथ्य पर
उन संवेदनाओ पर
जो मेरे अंतश में
उसकी गहराई में
पैठ कर रही है
परत दर परत
और चाह
विराट की
किन्तु लघुता से
बस यही है
आकांक्षा
और यहीं
मेरे अंतश की उड़ान
नये सृजन की
अपने स्वप्न को
पूर्ण करने की
सदा अपने को
अपूर्ण समझने की
मेरे अंतश की उड़ान
प्रण
नवीन सृष्टि का नहीं
सृष्टि में नवीन का
चेतना का
गति का
जो अभी अवचेतन है
जड़ है
यात्रा
अनन्त तक की
किन्तु आदि से
बोध
स्थूलता का
किन्तु सूक्ष्म से
दृढ़
अपनी क्रिया पर
अपने पथ्य पर
उन संवेदनाओ पर
जो मेरे अंतश में
उसकी गहराई में
पैठ कर रही है
परत दर परत
और चाह
विराट की
किन्तु लघुता से
बस यही है
आकांक्षा
और यहीं
मेरे अंतश की उड़ान
छूना चाहता हूँ............
छूना चाहता हूँ
मैं
तुम्हारी उस धड़कन को
जिसमें अभी भी
कहीं न कहीं विश्वाश वाकी है
अपने लिए
अपने उन स्वप्नों को
सच करने के लिए
जो अभी अपूर्ण है
जिन्हें पूर्ण करने का
तुमने कभी प्रण लिया था
जगाना चाहता हूँ
मैं
तुम्हारे उन अहसासों को
जो तुम्हारे अन्दर
परत दर परत
पैठ कर चुके है
जिन्हें तुमने कभी खुली आँखों से
महसूस किया था
जिसे एक नया रूप देने को
तुम दृढ़ थे
देखना चाहता हूँ
तुम्हारे उत्कर्ष को
विजय पथ को
जिसे तुमने कभी
असम्भव समझते हुए भी
भविष्य को दिशा देने
स्वयं चुना था
अपनी इच्छा शक्ति से
अपनी इच्छा शक्ति से
मैं
तुम्हारी उस धड़कन को
जिसमें अभी भी
कहीं न कहीं विश्वाश वाकी है
अपने लिए
अपने उन स्वप्नों को
सच करने के लिए
जो अभी अपूर्ण है
जिन्हें पूर्ण करने का
तुमने कभी प्रण लिया था
जगाना चाहता हूँ
मैं
तुम्हारे उन अहसासों को
जो तुम्हारे अन्दर
परत दर परत
पैठ कर चुके है
जिन्हें तुमने कभी खुली आँखों से
महसूस किया था
जिसे एक नया रूप देने को
तुम दृढ़ थे
देखना चाहता हूँ
तुम्हारे उत्कर्ष को
विजय पथ को
जिसे तुमने कभी
असम्भव समझते हुए भी
भविष्य को दिशा देने
स्वयं चुना था
अपनी इच्छा शक्ति से
अपनी इच्छा शक्ति से
अज्ञात की चाह.......
अज्ञात की चाह
अनन्त तक
बस यहीं मेरा प्रण
क्योंकि, ज्ञेय कुछ नहीं
मात्र, अज्ञेय का सूक्ष्म
और सूक्ष्म, विराट का भ्रम
सब अपूर्ण
क्योंकि पूर्ण, सृजन का अंत
सृजन, असीम का बिन्दु
और बिन्दु, अनंत का पर्याय
जो ज्ञेय है
वो पूर्ण नहीं
जो अपूर्ण
वो ज्ञेय नहीं
और दोनों
मात्र भ्रांतियाँ
स्वयं के अंहकार की
उन्माद की
किन्तु, वास्तविकता
शून्य
इसलिए
अज्ञात की चाह
अनन्त तक
बस यहीं मेरा प्रण
क्योंकि, ज्ञेय कुछ नहीं
मात्र, अज्ञेय का सूक्ष्म
और सूक्ष्म, विराट का भ्रम
सब अपूर्ण
क्योंकि पूर्ण, सृजन का अंत
सृजन, असीम का बिन्दु
और बिन्दु, अनंत का पर्याय
जो ज्ञेय है
वो पूर्ण नहीं
जो अपूर्ण
वो ज्ञेय नहीं
और दोनों
मात्र भ्रांतियाँ
स्वयं के अंहकार की
उन्माद की
किन्तु, वास्तविकता
शून्य
इसलिए
अज्ञात की चाह
बहुत याद आती है..............
बहुत याद आती है
जीवन की
कुछ अनकहीं बातें
कुछ ऐसी
जो दे सकती थी
मुझे एक नया आयाम
मिटा सकती थी
मेरे अंधकार को
भर सकती थी
मेरे मन में
प्रेम की अनंत अनुभूति
समर्पण का संसार
त्याग की भावना
और कुछ ऐसी
जो दे सकती थी
औरों को महसूस करने को कुछ नया
लेकिन दबी ही रहीं
मन ही मन
बे बातें
पर मिटी नहीं
जीवंत है
मुझे प्रेरणा देने के लिए
फिर से कुछ कहने के लिए
कुछ अनकहीं बातें
जीवन की
कुछ अनकहीं बातें
कुछ ऐसी
जो दे सकती थी
मुझे एक नया आयाम
मिटा सकती थी
मेरे अंधकार को
भर सकती थी
मेरे मन में
प्रेम की अनंत अनुभूति
समर्पण का संसार
त्याग की भावना
और कुछ ऐसी
जो दे सकती थी
औरों को महसूस करने को कुछ नया
लेकिन दबी ही रहीं
मन ही मन
बे बातें
पर मिटी नहीं
जीवंत है
मुझे प्रेरणा देने के लिए
फिर से कुछ कहने के लिए
कुछ अनकहीं बातें
करता हूँ मैं अपनी............
करता हूँ मैंअपनी
सारी कुंठायें पूरी
स्वप्न में
जो नहीं हूँ
हो जाता हूँ
जो प्राप्त नहीं किया है
कर लेता हूँ
खों जाता हूँ
एक सुखद अनुभूति मैं
और देता हूँ उत्तर
उन्हें
जिन्होंने मेरे अस्तित्व पर घात किया
ख़ुद से मुझे
छीनने का प्रयास किया
करता हूँ अनुभव
हर उन लम्हों का
जब मैं अपने सूक्ष्म को
विराट मैं बदलते देखता हूँ
हर लक्ष्य को
कदमों में
और देखता हूँ
अपने हाथ की
उन धुंधली होती हुई रेखाओं को
जिन्होंने मेरे
अजेय जीवन पथ को
धुंधला घोषित कर दिया
सारी कुंठायें पूरी
स्वप्न में
जो नहीं हूँ
हो जाता हूँ
जो प्राप्त नहीं किया है
कर लेता हूँ
खों जाता हूँ
एक सुखद अनुभूति मैं
और देता हूँ उत्तर
उन्हें
जिन्होंने मेरे अस्तित्व पर घात किया
ख़ुद से मुझे
छीनने का प्रयास किया
करता हूँ अनुभव
हर उन लम्हों का
जब मैं अपने सूक्ष्म को
विराट मैं बदलते देखता हूँ
हर लक्ष्य को
कदमों में
और देखता हूँ
अपने हाथ की
उन धुंधली होती हुई रेखाओं को
जिन्होंने मेरे
अजेय जीवन पथ को
धुंधला घोषित कर दिया
मैं कौन हूँ ? ..............
मैं कौन हूँ ?
एक प्रश्न
मेरे अंतश का
'कौन'? एक अज्ञात
और 'मैं'
एक असत्य
और हूँ
एक व्यर्थ की बहस
एक अज्ञात,
एक असत्य,
एक व्यर्थ
तो सत्य क्या कुछ नहीं ?
यदि नहीं
तो फिर मैं क्यों ?
क्या असत्य की व्याख्या के लिए?
या सत्य के बोध के लिए
यदि यही
तो क्या मात्र मैं साधन?
यदि हूँ
तो साध्य भी मैं
यदि कुछ नहीं
तो फिर
मैं कौन हूँ ?
एक प्रश्न
मेरे अंतश का
'कौन'? एक अज्ञात
और 'मैं'
एक असत्य
और हूँ
एक व्यर्थ की बहस
एक अज्ञात,
एक असत्य,
एक व्यर्थ
तो सत्य क्या कुछ नहीं ?
यदि नहीं
तो फिर मैं क्यों ?
क्या असत्य की व्याख्या के लिए?
या सत्य के बोध के लिए
यदि यही
तो क्या मात्र मैं साधन?
यदि हूँ
तो साध्य भी मैं
यदि कुछ नहीं
तो फिर
मैं कौन हूँ ?
शून्य की खोज में..............
शून्य की खोज में
मैं एक बार
निकल गया अनंत तक
महीनों,बर्षों तक
परन्तु जब मिला
तो एक क्षण में,
अनंत में नहीं,अंत में नहीं
अंतश में
फिर भी भ्रम
शून्य में मैं
या मुझमें शून्य
एक और खोज
सार्थकता की
स्वयं की प्रमाणिकता की
आदि से अनंत तक
भाव से अभाव तक
पूर्ण से अपूर्ण तक
हेतु से साध्य तक
फिर भी खाली
मैं और मेरा प्रश्न
लकिन फिर मिला
फिर एक क्षण में
मुझे मेरा उत्तर
ज्ञान की ऊंचाईयों से नहीं
साधना की गहराईयों से नहीं
मेरी अज्ञानता के
अंतश से
वो था
न शून्य मैं
न मुझमें शून्य
मैं ही शून्य
शून्य ही मैं
मैं ही शून्य
शून्य ही में
मैं एक बार
निकल गया अनंत तक
महीनों,बर्षों तक
परन्तु जब मिला
तो एक क्षण में,
अनंत में नहीं,अंत में नहीं
अंतश में
फिर भी भ्रम
शून्य में मैं
या मुझमें शून्य
एक और खोज
सार्थकता की
स्वयं की प्रमाणिकता की
आदि से अनंत तक
भाव से अभाव तक
पूर्ण से अपूर्ण तक
हेतु से साध्य तक
फिर भी खाली
मैं और मेरा प्रश्न
लकिन फिर मिला
फिर एक क्षण में
मुझे मेरा उत्तर
ज्ञान की ऊंचाईयों से नहीं
साधना की गहराईयों से नहीं
मेरी अज्ञानता के
अंतश से
वो था
न शून्य मैं
न मुझमें शून्य
मैं ही शून्य
शून्य ही मैं
मैं ही शून्य
शून्य ही में
कहाँ मिलती है किसी को मंज़िलें......
कहाँ मिलती है किसी को मंज़िलें
यूँ ही
बिना मोड़ के
मोड़,पथ्य की नियति
नियति मनुष्य की सोच
और इसी सोच पर
बनता बिगड़ता है
मानव- संकल्प
चाह,इच्छा,अभिलाषा
अनंत तक
और सोच
जड़,स्थिर
फिर कैंसो हो लक्ष्य पूर्ण
जब स्वयं अपूर्ण
हर कदम एक इतिहास
इतिहास,भविष्य का पथ्य
और भविष्य
हमारा अगला कदम
नियति केवल मानव मन की मरीचिका
और नियति का मोड़
उसका प्रतिबिम्ब
सत्य केवल मानव
उसका कदम
उसकी गति ,
यूँ ही
बिना मोड़ के
मोड़,पथ्य की नियति
नियति मनुष्य की सोच
और इसी सोच पर
बनता बिगड़ता है
मानव- संकल्प
चाह,इच्छा,अभिलाषा
अनंत तक
और सोच
जड़,स्थिर
फिर कैंसो हो लक्ष्य पूर्ण
जब स्वयं अपूर्ण
हर कदम एक इतिहास
इतिहास,भविष्य का पथ्य
और भविष्य
हमारा अगला कदम
नियति केवल मानव मन की मरीचिका
और नियति का मोड़
उसका प्रतिबिम्ब
सत्य केवल मानव
उसका कदम
उसकी गति ,
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